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Sunday, July 11, 2010

मन समर्पित, तन समर्पित

श्री राम अवतार त्यागी जी द्वारा लिखी गयी यह कविता जिसे हमने हिंदी की पुस्तक में पढ़ा था और इसका भाव यह है, कि कवि तन मन शरीर व आत्मा सब देश को समर्पित करने के बाद भी देश के लिए कुछ और करना चाहता है! दूसरी ओर देश का नेतृत्व और व्यवस्था  देखी जहाँ 60 वर्षों से लूटने के बाद भी तृप्ति नहीं होती, अपने स्विस खाते भरने हेतु देश को खोखला करने में संकोच नहीं! सत्य- असत्य, असली नकली के इस भेद को समझ जायेंगे जिस दिन, विश्व के क्षितिज पर चमकेंगे, विश्वगुरु  होंगे फिर उस दिन!...तिलक संपादक
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मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

माँ तुम्हारा ॠण बहुत है, मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजा कर भाल जब भी
कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

मांज दो तलवार, लाओ न देरी
बाँध दो कस कर क़मर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया घनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण क्षण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

तोड़ता हूँ मोह का बन्धन, क्षमा दो
गांव मेरे, द्वार, घर, आंगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बायें हाथ में ध्वज को थमा दो

यह सुमन लो, यह चमन लो
नीड़ का त्रण त्रण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं

देश केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं !